नए वर्ष के आगमन पर..(कँवल भारती)

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नया वर्ष तू क्या लेकर आया है?

आशाएं विश्वास हमें तो करना ही है

क्यों न करेंगे? करते ही आये हैं.

वांच रहे हैं लोग राशियाँ राशिफल में

कुछ के चेहरे मुरझाये हैं,

कुछ के फिर भी खिले हुए हैं.

आँखों देखा नहीं समझते, कागद लेखे सीस नवाते.

पता नहीं क्यों विसराते हम इस यथार्थ को

वृक्ष बबूल का बोएँगे तो आम कहाँ पाएंगे?

बोएँगे नफरत जग में तो प्यार कहाँ पाएंगे?

बिरलाओं के लिए उजड़ते रहे झोंपड़े ज्यों ही,

क्या रोक पाएंगे कदम बगावत के हम?

शायद सत्ता का चरित्र ही यह है

धरती खाली हो गरीब से जल्दी,

कुछ का करें सफाया बागी, कुछ का सेना.

नए वर्ष में लगता है अब ये ही होना.

सीमित दंगे राष्ट्रवाद के फल देवेंगे कारपोरेट को,

हम आपस में सिर फोड़ेंगे, वे ‘सुधार’ को तेज करेंगे.

हम खेलेंगे जाति-धर्म के अंगारों से,

वे लूटेंगे सकल पदारथ जो भू-माहीं.

नए वर्ष में…

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About Rashid Faridi

I am Rashid Aziz Faridi ,Writer, Teacher and a Voracious Reader.
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